Ridmalsar Sipahiyan

Ridmalsar Bikaner (Raj) India

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Dr.Heena Sameja

Posted by Sadik Khan Panwar on January 8, 2013 at 6:10 AM Comments comments (1)

HEENA SAMEJA D/O MANZOOR KHAN SAMEJA   DOB 17.10.1989

School-Shri Gurunanak Girls Sen secschool   10th-90.17%   12th-88%  

MBBS-2008 batch FROM AMRITSAR

 

Bulaki Khan Sameja (Hazi)

Posted by Sadik Khan Panwar on January 8, 2013 at 6:00 AM Comments comments (0)


HAZI BULAKI KHAN SAMEJA S/O JANAB NIZIMUDDIN KHAN UNNAD   RETIRED- SENIOR TEACHER   TULWARA JHEEL  KNOWN AS JAGIRDAR


Mustaque Ahmed Panwar (Hazi)

Posted by Sadik Khan Panwar on August 3, 2012 at 1:40 PM Comments comments (0)

Born in Ridmalsar Bikaner on 23.09.1931 at house of late Kamruddin Panwar Janab Mustaque Ahmed panwar studied hard and completed his M.A.(history) and become a teacher (headmaster) and retired as a lecturer on 31.09.1989 after serving35 years.He was so religious at his tender age that he started praying Namaaz Since when he was only 16 years old and continued still now at his old age.this is the secret of his nature.

रिडमलसर में दिनांक 23.09.1931 को मरहूम कमरुद्दीन पंवारके घर जन्मे हाजी मुस्ताक अहमद पंवार ने पढाई में कड़ी मेहनत की और इतिहास विषय में एम.ए- करके आप एक अध्यापक (प्रधानाध्यापक ) बने और 31.09.1989 को 35 साल की राजकीय सेवा के बाद व्याख्याता पद से सेवानिर्वत हुए.आप बचपन से ही इतने धार्मिक प्रवर्ति के थे कि आपने 15- 16 साल की उम्र से नमाज़  अदा करनी शुरू की और आज भी 80 साल की उम्र में भी नमाज़ अदा कर अपना फ़र्ज़ अदा कर  रहे हैं.अल्लाह सभी मुसलमान भाई लोगो को उनसे सीख़ लेने की तौफीक अदा करें.

 



History of Sipahi Samaz

Posted by Sadik Khan Panwar on July 7, 2012 at 11:20 PM Comments comments (0)

मारवाड़ मैं मुसलमान राजपूत जगह जगह पाए जाते है.ये सिपाही कहलाते हैं.इनमे हर कौम के राजपूत शामिल है.जो मुसलमानी राज में मुसलमान बनाये गए थे.राजपूतों को मुसलमान बनाने का सिलसला लगभग मुहम्मद बिन कासिम  की चढ़ाई से संवत 770 के करीब अरब की तरफ से सिंध के ऊपर लड़ाई  से हुई थी.से शुरू हुआ था.जिसका खात्मा औरंगजेब के मरने पर संवत 1762 में हुआ.इस 1000 बरस के अरसे में लाखों राजपूत मुसलमान कर दिए गए.शुरू  शुरू मैं जबकि अरबों और तुर्कों मैं हमले होते थे तो यह कायदा था की फ़तेह होने के पीछे आम हिंदुवो और खास कर राजपूतों और दूसरी लड़ने वाली कोमों के आदमियों को या तो मुसलमान कर देते थे या मार डालते थे.की जिससे वे मुकाबला करने लायक न रहे.उस वक़्त राजपूत कौम में जो लड़ाई में हारकर फिर मुकाबला नहीं कर सकते थे,जान बचाने  की दो ही सूरतें थी.या तो मुसलमान हो जाते थे या राजपूती छोड़ करके कमीन जातों में मिल जाते थे. और उन्हीं  का कसाब भी करने लगते थे.आज जो हर कौम में राजपूतों की खान्पें  पाई जाती है वे उन्ही दिनों में मुसलामानों के दबाब से उन मैं शामिल हुई थी. और जो मुसलमान हो जाते थे उनको सिपाहियों में  नोकरी मिल जाती थी.यही लोग जिनकी औलाद कहीं देस्वाली पठान ,कहीं रंधर ,कहीं मुसलमान राजपूत,कहीं सिन्धी सिपाही और कहीं देसवाली   कहलाती है

मारवाड़ राजस्थान में मुस्लिम  राजपूतो के कई थोक है.मगर ये चार बड़े थोक है और सब अपनी असली खांप के नाम से सिपाहियों में जाने जाते है.

1.सिन्धी जो पश्चिम मारवाड़ में होते है

2.देशवाली जो पूर्व मारवाड़ में हर जगह होते है

3.नायक ये जोधपुर मे ज्यादा है

4.क्यामखानी ये चौहान भी जाने जाते है और नागौर,डीडवाना की तरफ बहुत है

सिपाही समाज के इतिहास पर एक नज़र डालने पर ये ज्ञात हुआ की बुजुर्गो के कहे अनुसार समाज के बही-भाट,लंगे,ख्यात और प्राचीन राजघराने से जुड़े परिवारों से सिपाही समाज की जानकारी मिलती है आज भी सिपाही समाज की विभिन जातियों के बही-भाट,जोबनेर के पास आसलपुर से आते है इन भाटो के पास सिपाही समाज का पूरा इतिहास है सिपाही समाज के ज्यादातरलोग जैसलमेरऔर सिंध से आकर राजस्थान के विभिन हिस्सों(राज्यों ) में बस गए.जिन्हें कही सिन्धी,कही सिपाही और दुसरे नामो से भी जाना जाता है बीकानेर में भी सिपाही समाज का एक संगठन है जो समाज की ऐतिहासिक प्रस्ठभूमि पर काम कर रहा है जिन्हें प्रगतिशील सिपाही समाज और प्रगतिशील सिन्धी सिपाहीसमाज कहा जाये तो कोई फर्क नहीं होगा क्योंकि ये संगठन सिन्धी-समाज की जातियों का ही प्रतिनिधि है इस जाति का मूल नाम सिपाही है तो इस जाति का इलाकाई और भोगोलिक नाम सिन्धी है. सिन्धी-सिपाही एक-दुसरे के पर्याय है बाड़मेर से गंगानगर के इलाके तक बसे लोग कही अपने भोगोलिक नाम से जाने जाते है तो कही अपने मूल नाम से जाने जाते है दरअसल में इस जाति के भोगोलिक और मूल नाम को जोड़कर देखा जाये तो इन पूरी जातियो का नाम सिन्धी सिपाही है जो सिंध से आकर बाड़मेर से गंगानगर रिडमलसर बीकानेर तक में बसी हुई है इनकी सभी उपजातियां सामान है और आपस में शादी-ब्याह होते है गंगानगर,हनुमानगढ़ के राठी इलाके में बसी इस जाति को इलाके के लिहाज से राठ कहा जाता है. सिन्धी सिपाही समाज की ऐतिहासिक जानकारी पर अभी शोध जारी है मूल रूप से सिन्धी सिपाही एक ही नस्ल और जाति है.

 

Rajput Muslims are found in many places in Rajasthan India and Pakistan. They are called Sipahi who converted their religion during reign of the Muslim Kings in India included different sub caste of Rajput. The Conversion of Rajput into Muslim started when Mohammad Bin Kasim attacked Sindh from Arab in 770 and it ended when Aurangzeb died in 1762.during these thousand years hundred billion of Rajput was converted into Muslim. Whenever there was any invasion of The Arabs and The Turks it was in tradition that after winning war either Rajput especially warrior used to be killed or converted into Muslim so that they might not be able to fight. There was only two ways for Rajput who was unable to fight to save their lives either convert into Muslim or mixed their caste into lower caste of the Hindus and some of them started to use their sub caste. Which are also found now a day in lower caste Hindus. All these sub castes of Rajput which are found in different caste and religion are originally from Rajput who were converted during the reign of The Muslims and whoever converted into Muslim were given service in the kingdom as a soldier (Sipahi).  Now they are called Deshwali Pathan ,Randhar, Muslim Rajput, Sindhi Sipahi ,Deshwali etc. according to places. most of these Muslim write their names with Rajput in Pakistan. After study the history of Sipahi Samaz and from the books of our ancestors we have come to know that most of people of Sipahi Samaz came from Sindh (now in Pakistan) and settled at different places  in Rajasthan i.e. Bikaner.,Sriganganagar,.Jaisalmer,Barmer. The research about the history of Sipahi Samaz is continued still now.

 By: Sadik Khan Panwar

द्वारा:

हिंदी अनुवादन

सदीक खान पंवार

७ क १० पवनपुरी साउथ बीकानेर

स्रोत :

वीर सिपाही स्मारिका

Source:

www.ridmalsar.webs.com

www.veersipahi.wordpress.com

www.sipahisamaz.com


Imaan khan Panwar and Hassan Khan Panwar

Posted by Sadik Khan Panwar on June 26, 2012 at 12:40 AM Comments comments (0)

My late grand father Kammu Khan Panwar's loving brothers and my grand father Janab Imaam Khan panwar with his brother Janab Hassan khan panwar

Panorama scene of mirza wali dargah

Posted by Sadik Khan Panwar on June 19, 2012 at 1:30 AM Comments comments (0)

Panorama scene of mirza wali dargah ridmalsar bikaner

Sardar Sakhi Sawant Khan Panwar Urf Zheetu Khan Panwar

Posted by Sadik Khan Panwar on June 19, 2012 at 1:15 AM Comments comments (0)

Sardar Sakhi Sawant Khan Panwar Urf Zheetu KhanPanwar was Born in Panwar Family at Ridmalsar Bikaner India in 1770 A.D. he used to live in Jorbeed (Forest) at Sawantpur Ridmalsar Bikaner near railway line.he spent all his life there and died in 1847. his graveyard (Mazar) is built there. all the panwar families celebrate his Ursh every year to prove that he was their great saint

 

 

Panorama scene of mirza wali dargah

Posted by Sadik Khan Panwar on June 19, 2012 at 1:15 AM Comments comments (0)

Panorama scene of mirza wali dargah Ridmalsar Bikaner taken at the time of Ursh of mirza wali 2011

Mirza wali Dargah Ridmalsar

Posted by Sadik Khan Panwar on June 15, 2012 at 10:55 PM Comments comments (0)

                                    मिर्ज़ा वली की करामात

बीकानेरसे 10 किलोमीटर दूररिडमलसर सिपाहियान में मिर्ज़ामुराद बेग काआस्ताना (दरगाह) है जिनके सालाना उर्श तक़रीबन 20 साल से मनाये जा रहे है.बहुत अरसे पहले आप गाँव की मस्जिद  में रहते थे. जब आपके पर्दा फरमाने का वक़्त करीब आया तो आपने गाँव वालों को ज़मा किया और कहा आप लोग दुनिया की कामयाबी चाहते हो तो मुझे मस्जिद में दफनाना और आखिरत की कामयाबी  चाहते हो तो मुझे कब्रिस्तान में दफनाना . उस वक़्त के बुजर्गो ने निहायत ही दूरदर्शिता का परिचय दिया जो उन्हें कब्रिस्तानमें दफनाया क्योंकि दुनिया चार दिन की है, जैसे तैसे गुजर जाएगी,आखिरत की जिंदगी कभी ख़त्म होने वाली नहीं है.उस ज़माने में लोग बहुत ही ताक़तवर और तंदरुस्त होते थे.और गाँव रिडमलसर के आसपास के गाँव में चर्चा हुआ करती थी कि शादी के मोके पे हलवा, चावल बनाये जाते थे. जिसके बारे में कहावते मशहूर है कि रात को लोग कड़ाई में सो जाया करते थे.और खाना तैयार होकर ज्योही खिलाया जाता था तो घंटे भर में कडाव साफ कर दिया जाता था .एस बात अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक़्त के लोगो कि खुराक कैसी होती थी. काबिले गौर है कि हज़रत मिर्ज़ा मुराद बेग ने एक हांड़ी में सवा सेर चावल पकाए थे . और पुरे गाँव को खाना खिलाया .जब हांड़ी का पूरा ढक्कन खोला गया तो उसमे जितने चावल पकाए गए थे वो चावल बाकि बचे हुए मिले थे.लोगो ने यह मंज़र देखा तो उनकी अक्ल दांग रह गयी और दूर दूर तक चर्चे होने लगे. उस वक़्त केलोगो का अकीदा निहायत ही मजबूत और पक्का होता था.बरसात होने में देरी होने के कारण गाँव वालों का दस्तूर था की मिर्ज़ा मुराद बेग के आस्ताने पर लोग जमा होते औ रसीरनी  करते .दूर दूर तक बादली नहीं होने  के बावजूद भी शाम तक घटायें आती बरसात बरस कर चली जाती.यह हरसाल त्योंहार  की तरह मनाया जाने लगा.आज भी अकीदतमंद लोग फैज़ पते है और अपनी झोलियाँ (दामन;) मुरादों से भरते है.सबसे बड़ी बात यह है की वली के दरबार में किसी तरह की मजहबी पाबन्दी नहीं होती.किसी भी मजहब का मानने वाला हो दरबारमें हाज़िर होकर जायज़ मुरादों के लिए झोली फैलाये और दामन ए मुराद से मालामाल हो जाता था.शर्त यहहै की अकीदा रखता हो.अकीदतमंद लोग एन करामातों पर इतफाक रखते है.वली अल्लाह के दोस्त होते है. वली के माईने मालिक के होते है.अल्लाहने बेशुमार ताक़तों से वलियों को नवाज़ा है..वे खुद अल्लाह और उसके रसूल  के  इश्को मुहब्बत की भट्टी में अपने आपको जलाकर राख कर देतें है.तब इनके अंदर अल्लाह की तरफ से वो ताकत औ कुव्वत  पैदा हो जाती है अल्लाह के वली मौत से पहले फ़ानी हो जाते है.मगर दीन की दुनिया  में ये लोग बादशाही करते है.इससे बढ़कर बादशाही  क्या होगी की जो कुछ एन हज़रात की जुबान  से निकलता है.परवरदिगार आलम उनकी दुआए पूरी फरमाता  है.आज भी मिर्ज़ा वली के आस्ताना ए मुबारक से अकीदतमंद लोग फैज़ उठाते है.यानि औलिया का कहा हुआ अल्लाह का फरमान होताहै.अगर चे यह अल्लाह के बन्दे की हलक से निकला हुआ कलाम हो.

 

वलीकी करामात

द्वारा

जनाब सरफ़राज़ खान  मांगलिया

सदर गाँव रिडमलसर,बीकानेर

 

 


Mehfooz Ali Panwar

Posted by Sadik Khan Panwar on May 29, 2012 at 1:15 PM Comments comments (0)


 

जनाब हसन खानपंवार  के घर रिडमलसर में जन्मे जनाब महफूज़ अली पंवार बचपन से ही पढाई में अव्वल रहे और शिक्षा ग्रहण करने के बाद शिक्षा सेवा में व्याख्याता पद पर आपका चयन हुआ.उसके बाद आप प्रधानाध्यापक माध्यमिक शिक्षा में लोक सेवाआयोग अजमेर  द्वारा चयन हुआ.तब से लगातार शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर आसीन रहने के बाद आप शिक्षा निदेशालय बीकानेर में सहायक निदेशक के पद रहने वाले गाँव रिडमलसर के एक मात्र व्यक्ति है

Born at house of Janab Hasan Khan Panwar Mr. Mahfooz Ali Panwar was a brilliant student. After study he was selected as school lecturer after that he was selected as a headmaster secondary school by RPSC Ajmer. He has been serving in the education department as an Assistant Director of the directorates Bikaner of education department

 

 




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