Ridmalsar Sipahiyan

Ridmalsar Bikaner (Raj) India

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Panorama scene of mirza wali dargah

Posted by Sadik Khan Panwar on June 19, 2012 at 1:30 AM Comments comments (0)

Panorama scene of mirza wali dargah ridmalsar bikaner

Sardar Sakhi Sawant Khan Panwar Urf Zheetu Khan Panwar

Posted by Sadik Khan Panwar on June 19, 2012 at 1:15 AM Comments comments (0)

Sardar Sakhi Sawant Khan Panwar Urf Zheetu KhanPanwar was Born in Panwar Family at Ridmalsar Bikaner India in 1770 A.D. he used to live in Jorbeed (Forest) at Sawantpur Ridmalsar Bikaner near railway line.he spent all his life there and died in 1847. his graveyard (Mazar) is built there. all the panwar families celebrate his Ursh every year to prove that he was their great saint

 

 

Panorama scene of mirza wali dargah

Posted by Sadik Khan Panwar on June 19, 2012 at 1:15 AM Comments comments (0)

Panorama scene of mirza wali dargah Ridmalsar Bikaner taken at the time of Ursh of mirza wali 2011

Mirza wali Dargah Ridmalsar

Posted by Sadik Khan Panwar on June 15, 2012 at 10:55 PM Comments comments (0)

                                    मिर्ज़ा वली की करामात

बीकानेरसे 10 किलोमीटर दूररिडमलसर सिपाहियान में मिर्ज़ामुराद बेग काआस्ताना (दरगाह) है जिनके सालाना उर्श तक़रीबन 20 साल से मनाये जा रहे है.बहुत अरसे पहले आप गाँव की मस्जिद  में रहते थे. जब आपके पर्दा फरमाने का वक़्त करीब आया तो आपने गाँव वालों को ज़मा किया और कहा आप लोग दुनिया की कामयाबी चाहते हो तो मुझे मस्जिद में दफनाना और आखिरत की कामयाबी  चाहते हो तो मुझे कब्रिस्तान में दफनाना . उस वक़्त के बुजर्गो ने निहायत ही दूरदर्शिता का परिचय दिया जो उन्हें कब्रिस्तानमें दफनाया क्योंकि दुनिया चार दिन की है, जैसे तैसे गुजर जाएगी,आखिरत की जिंदगी कभी ख़त्म होने वाली नहीं है.उस ज़माने में लोग बहुत ही ताक़तवर और तंदरुस्त होते थे.और गाँव रिडमलसर के आसपास के गाँव में चर्चा हुआ करती थी कि शादी के मोके पे हलवा, चावल बनाये जाते थे. जिसके बारे में कहावते मशहूर है कि रात को लोग कड़ाई में सो जाया करते थे.और खाना तैयार होकर ज्योही खिलाया जाता था तो घंटे भर में कडाव साफ कर दिया जाता था .एस बात अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक़्त के लोगो कि खुराक कैसी होती थी. काबिले गौर है कि हज़रत मिर्ज़ा मुराद बेग ने एक हांड़ी में सवा सेर चावल पकाए थे . और पुरे गाँव को खाना खिलाया .जब हांड़ी का पूरा ढक्कन खोला गया तो उसमे जितने चावल पकाए गए थे वो चावल बाकि बचे हुए मिले थे.लोगो ने यह मंज़र देखा तो उनकी अक्ल दांग रह गयी और दूर दूर तक चर्चे होने लगे. उस वक़्त केलोगो का अकीदा निहायत ही मजबूत और पक्का होता था.बरसात होने में देरी होने के कारण गाँव वालों का दस्तूर था की मिर्ज़ा मुराद बेग के आस्ताने पर लोग जमा होते औ रसीरनी  करते .दूर दूर तक बादली नहीं होने  के बावजूद भी शाम तक घटायें आती बरसात बरस कर चली जाती.यह हरसाल त्योंहार  की तरह मनाया जाने लगा.आज भी अकीदतमंद लोग फैज़ पते है और अपनी झोलियाँ (दामन;) मुरादों से भरते है.सबसे बड़ी बात यह है की वली के दरबार में किसी तरह की मजहबी पाबन्दी नहीं होती.किसी भी मजहब का मानने वाला हो दरबारमें हाज़िर होकर जायज़ मुरादों के लिए झोली फैलाये और दामन ए मुराद से मालामाल हो जाता था.शर्त यहहै की अकीदा रखता हो.अकीदतमंद लोग एन करामातों पर इतफाक रखते है.वली अल्लाह के दोस्त होते है. वली के माईने मालिक के होते है.अल्लाहने बेशुमार ताक़तों से वलियों को नवाज़ा है..वे खुद अल्लाह और उसके रसूल  के  इश्को मुहब्बत की भट्टी में अपने आपको जलाकर राख कर देतें है.तब इनके अंदर अल्लाह की तरफ से वो ताकत औ कुव्वत  पैदा हो जाती है अल्लाह के वली मौत से पहले फ़ानी हो जाते है.मगर दीन की दुनिया  में ये लोग बादशाही करते है.इससे बढ़कर बादशाही  क्या होगी की जो कुछ एन हज़रात की जुबान  से निकलता है.परवरदिगार आलम उनकी दुआए पूरी फरमाता  है.आज भी मिर्ज़ा वली के आस्ताना ए मुबारक से अकीदतमंद लोग फैज़ उठाते है.यानि औलिया का कहा हुआ अल्लाह का फरमान होताहै.अगर चे यह अल्लाह के बन्दे की हलक से निकला हुआ कलाम हो.

 

वलीकी करामात

द्वारा

जनाब सरफ़राज़ खान  मांगलिया

सदर गाँव रिडमलसर,बीकानेर